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देहरादून में ऐतिहासिक खोज: मालदेवता क्षेत्र में मिले 45 लाख साल पुराने जीवाश्म, वैज्ञानिकों में उत्साह की लहर
देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के बाहरी इलाके मालदेवता में भूवैज्ञानिकों को एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) ...

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देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के बाहरी इलाके मालदेवता में भूवैज्ञानिकों को एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने क्षेत्र में सर्वेक्षण के दौरान लगभग 45 लाख साल पुराने दुर्लभ जीवाश्म (Fossils) खोज निकाले हैं। इस असाधारण खोज ने न केवल वैज्ञानिक समुदाय को रोमांचित कर दिया है, बल्कि हिमालय की उत्पत्ति और विकासक्रम को समझने की दिशा में एक नया अध्याय भी जोड़ दिया है।
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खोज का विवरण: जानकारी के अनुसार, वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की देखरेख में शोधकर्ताओं का एक दल मालदेवता और उसके आस-पास के नदी घाटियों में भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण कर रहा था। इसी दौरान उन्हें तलछटी चट्टानों के बीच कुछ अजीबोगरीब आकृतियां दिखाई दीं। प्रारंभिक जांच और अत्याधुनिक तकनीकों (जैसे रेडियोमेट्रिक डेटिंग) के उपयोग के बाद, यह पुष्टि हुई कि ये अवशेष लगभग 45 लाख साल पुराने हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये जीवाश्म प्राचीन काल के स्तनधारी जीवों के दांत और हड्डियों के हिस्से हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों में उत्साह की वजह: वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. कालाचंद सैंन ने इस खोज पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए बताया कि “यह खोज अभूतपूर्व है। 45 लाख साल पुराना यह कालखंड (जिसे प्लायोसीन युग कहा जाता है) हिमालय के भूवैज्ञानिक इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है। यह वह समय था जब हिमालयी क्षेत्र में जलवायु और पर्यावरण में बड़े बदलाव हो रहे थे।” उन्होंने आगे कहा कि इन जीवाश्मों के अध्ययन से न केवल उस समय के जीवों के बारे में पता चलेगा, बल्कि यह भी समझने में मदद मिलेगी कि प्राचीन काल में हिमालयी नदियाँ कैसे बहती थीं और वहां का ईकोसिस्टम कैसा था।
शिवालिक क्षेत्र का महत्व: हिमालय का बाहरी हिस्सा, जिसे शिवालिक रेंज के नाम से जाना जाता है, जीवाश्मों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। देहरादून भी इसी क्षेत्र का हिस्सा है। पिछली सदी में भी इस क्षेत्र से कई महत्वपूर्ण खोजें हुई हैं, लेकिन मालदेवता में इतने पुराने अवशेषों का मिलना इसे विशेष बनाता है। वैज्ञानिक अब इस क्षेत्र का अधिक गहनता से सर्वेक्षण करने और अन्य संभावित जीवाश्म स्थलों की पहचान करने की योजना बना रहे हैं।
अगली कार्रवाई: वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के अनुसार, मिले हुए जीवाश्मों को अब प्रयोगशाला में संरक्षित किया जाएगा। इसके बाद देश-विदेश के विशेषज्ञों के साथ मिलकर इन पर विस्तृत शोध किया जाएगा। शोध के परिणाम आने वाले समय में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किए जाएंगे, जो निश्चित रूप से उत्तराखंड के भूवैज्ञानिक महत्व को वैश्विक स्तर पर और मजबूत करेंगे। इस खोज को देखने के लिए स्थानीय लोगों में भी काफी कौतूहल देखा जा रहा है।
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