उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सभी निचली अदालतों को आदेश दिया है कि वे आपराधिक मामलों में हर आरोपी की उम्र की अनिवार्य रूप से जांच करें। यह फैसला न्यायमूर्ति संजय कुमार मिश्रा की एकल पीठ ने दिया। कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में यह देखने में आया है कि अभियुक्त को नाबालिग होने के बावजूद बालिग मान लिया जाता है, जिससे उसे किशोर न्याय बोर्ड के बजाय सामान्य अदालत में पेश किया जाता है। #उत्तराखंडहाईकोर्ट #निचलीअदालतें #उम्रकीजांच
न्यायालय ने यह आदेश ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया। इसमें एक नाबालिग पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5 (यौन हमला) के तहत मुकदमा चल रहा था। मामले की सुनवाई के दौरान, अभियुक्त के वकील ने कोर्ट को बताया कि घटना के समय उनके मुवक्किल की उम्र 18 साल से कम थी, जबकि पुलिस ने उसे बालिग मानकर सामान्य अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी। #नाबालिग #पॉक्सोएक्ट #न्यायव्यवस्था
अदालत ने कहा कि पुलिस और अभियोजन पक्ष दोनों की यह जिम्मेदारी है कि वे चार्जशीट दाखिल करने से पहले आरोपी की उम्र की पुष्टि करें। इस लापरवाही के कारण न्याय में देरी होती है और आरोपी को अनुचित रूप से अधिक दंड का सामना करना पड़ सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर निचली अदालतें इस आदेश का पालन नहीं करती हैं, तो इसे अवमानना माना जाएगा। #न्यायमेंदेरी #पुलिसजांच #कानूनीप्रक्रिया
इस आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी नाबालिग गलत तरीके से सामान्य अदालत में पेश न हो और उसे किशोर न्याय अधिनियम के तहत मिलने वाले सभी अधिकार प्राप्त हों। यह निर्णय न्यायपालिका में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। #किशोरन्यायअधिनियम #न्यायिकसुधार #सुरक्षा