उत्तराखंड में डायबिटीज के मरीजों की संख्या में भारी उछाल आया है। पहाड़ी क्षेत्रों में बदलती जीवनशैली, खान-पान और शारीरिक श्रम की कमी इस बीमारी के मुख्य कारण बन रहे हैं। जानिए पूरी रिपोर्ट
देहरादून: कभी ‘बीमारियों से मुक्त’ माने जाने वाले उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में अब डायबिटीज (मधुमेह) एक गंभीर स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है। हालिया आंकड़ों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की लगभग 12 से 14 प्रतिशत आबादी शुगर की समस्या से जूझ रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब ग्रामीण क्षेत्रों और युवाओं में भी यह बीमारी तेजी से पैर पसार रही है।
क्यों बढ़ रहे हैं मामले? (मुख्य कारण)
- जीवनशैली में बदलाव: पहले पहाड़ों में लोगों का जीवन कठिन शारीरिक श्रम पर निर्भर था, लेकिन सड़कों के विस्तार और मशीनीकरण के कारण शारीरिक गतिविधियां कम हो गई हैं।
- खान-पान का बदलता स्वरूप: पारंपरिक मोटे अनाज (कोदा-झंगोरा) की जगह अब लोग प्रोसेस्ड फूड, अधिक चीनी और मैदा युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं।
- शहरीकरण और तनाव: बढ़ते शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण मानसिक तनाव (Stress) बढ़ा है, जो टाइप-2 डायबिटीज का एक बड़ा कारक है।
- जागरूकता और स्क्रीनिंग की कमी: स्वास्थ्य विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, नैनीताल और अल्मोड़ा जैसे जिलों में की गई स्क्रीनिंग में पाया गया कि कई लोगों को पता ही नहीं था कि वे डायबिटीज से पीड़ित हैं।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ों में डायबिटीज का स्तर महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक देखा जा रहा है। इसके साथ ही, यह बीमारी अब किडनी, हार्ट और आंखों की समस्याओं को भी जन्म दे रही है। डॉक्टरों के अनुसार, अगर समय रहते दिनचर्या में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा और भी भयावह हो सकता है।
बचाव के लिए 3 मुख्य सूत्र:
- संतुलित आहार: स्थानीय मोटे अनाज और फाइबर युक्त फलों को शामिल करें।
- सक्रिय दिनचर्या: प्रतिदिन कम से कम 30-45 मिनट टहलें या व्यायाम करें।
- नियमित जांच: 30 साल की उम्र के बाद साल में कम से कम एक बार शुगर लेवल की जांच जरूर कराएं।
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