देहरादून

उत्तराखंड में जल संरक्षण की ऐतिहासिक पहल, गैरसैंण से भूजल पुनर्भरण योजना का शुभारंभ

गैरसैंण। उत्तराखंड में गहराते जल संकट की चुनौती से निपटने और सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की दिशा में आज एक ऐतिहासिक अध्याय की शुरुआत हुई। विधानसभा सत्र के अवसर पर भराड़ीसैंण (गैरसैंण) स्थित विधानसभा भवन से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने “डायरेक्ट इंजेक्शन जल स्रोत पुनर्भरण योजना” का विधिवत शुभारंभ किया। इस महत्वपूर्ण पहल का उद्देश्य वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग कर भूजल स्तर को बढ़ाना और प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल की समस्या का स्थायी समाधान निकालना है।

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वैज्ञानिक तकनीक से पुनर्जीवित होंगे सूखे हैंडपंप

यह योजना स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय, जौलीग्रांट के तकनीकी सहयोग से संचालित की जा रही है। विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों द्वारा विकसित की गई ‘डायरेक्ट इंजेक्शन’ तकनीक के माध्यम से वर्षा के जल को उपचारित कर सीधे सूखे और निष्क्रिय पड़े हैंडपंपों के जरिए भूजल स्तर तक पहुंचाया जाएगा। यह प्रक्रिया एक्वीफर्स (भूजल भंडारों) को सीधे रिचार्ज करेगी, जिससे न केवल हैंडपंप पुनर्जीवित होंगे, बल्कि आसपास के क्षेत्र में भी जल स्तर में सुधार होगा। इस अवसर पर योजना की तकनीकी प्रक्रिया पर एक विस्तृत प्रस्तुति भी दी गई।

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पहले चरण में गैरसैंण और चौखुटिया पर फोकस

योजना का शुभारंभ करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि जल संरक्षण राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है और यह योजना भविष्य की जीवन रेखा साबित होगी। योजना के पहले चरण में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर गैरसैंण और चौखुटिया विकासखंडों के 20 चयनित सूखे हैंडपंपों को पुनर्भरण कर फिर से क्रियाशील बनाया जाएगा। इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद इस मॉडल को प्रदेश के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में भी लागू किया जाएगा, जहां जल स्रोत सूखने की कगार पर हैं।

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विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी के प्रयासों का परिणाम

इस योजना को धरातल पर उतारने में उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण की विशेष भूमिका रही है। उन्हीं के मार्गदर्शन और संकल्प के परिणामस्वरूप इस परियोजना के क्रियान्वयन के लिए 8 जुलाई, 2025 को विधानसभा के अंतर्राष्ट्रीय संसदीय अध्ययन, शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान और स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए थे। विधानसभा अध्यक्ष ने इस पहल को उत्तराखंड में सतत जल प्रबंधन की दिशा में मील का पत्थर बताया और कहा कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा का आधार बनेगी।

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