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उच्च न्यायालय ने सार्वजनिक शौचालय संचालन अनुबंध रद्द किया

10 साल का अनुबंध अवैध घोषित, नए निविदा प्रक्रिया के आदेश

देहरादून: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में सार्वजनिक शौचालयों के संचालन से जुड़े 10 साल के अनुबंध को रद्द करने का आदेश दिया है। न्यायालय ने कहा कि जब अनुबंध में मध्यस्थता (Arbitration) का प्रावधान मौजूद है, तो यह मामला अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। साथ ही, सरकार को नई पारदर्शी निविदा प्रक्रिया (Tender Process) शुरू करने का निर्देश दिया गया है।

❓ मामला क्या था?
👉 उत्तराखंड में 2015 में नगर निगमों के तहत सार्वजनिक शौचालयों के संचालन के लिए एक निजी एजेंसी के साथ 10 वर्ष का अनुबंध किया गया था। आरोप लगा कि अनुबंध प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी थी और सेवा मानक भी पूरे नहीं किए जा रहे थे।

❓ याचिका क्यों दायर की गई थी?
👉 एक सामाजिक संस्था ने जनहित याचिका दायर कर कहा कि ठेका देने में अनियमितता हुई और शौचालयों की हालत बदतर है। संस्था ने अनुबंध रद्द कर नई निविदा प्रक्रिया की मांग की।

❓ अदालत ने क्या निर्णय दिया?
👉 उच्च न्यायालय ने पाया कि अनुबंध में मध्यस्थता क्लॉज़ होने के कारण मामला अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। फिर भी, न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया कि सार्वजनिक हित में नया पारदर्शी टेंडर जारी किया जाए।

❓ इसका आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
👉 अब नगर निगमों को नए ठेकेदार चुनने होंगे। इससे शहरों में शौचालयों की स्थिति में सुधार की उम्मीद है और रखरखाव पर जवाबदेही बढ़ेगी।

❓ सरकार की अगली कार्यवाही क्या हो सकती है?
👉 शासन स्तर पर नए दिशानिर्देश तैयार किए जा रहे हैं ताकि भविष्य के अनुबंध पारदर्शी और जवाबदेह हों।

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