
देहरादून: भारतीय सैन्य इतिहास में उत्तराखंड (देवभूमि) का योगदान हमेशा से स्वर्णिम रहा है, लेकिन राजधानी देहरादून के ‘डिफेंस कॉलोनी’ में रहने वाले कुकरेती परिवार की कहानी अदम्य साहस और दुर्लभ देशभक्ति की एक ऐसी मिसाल है जो शायद ही दुनिया में कहीं और मिले। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, जब देश की सीमाएं धधक रही थीं, तब इस एक ही परिवार के पाँच सगे भाइयों ने एक साथ रणभूमि में मोर्चा संभाला था। सोशल मीडिया पर आज यह गौरवगाथा फिर से वायरल हो रही है।
विज्ञापन हेतु संपर्क करें - 📞 9639789000
अलग-अलग रेजिमेंट, एक ही संकल्प कुकरेती परिवार के ये पांचों भाई उस समय भारतीय सेना की अलग-अलग इकाइयों में तैनात थे, लेकिन 1971 के युद्ध के दौरान नियति उन्हें अलग-अलग मोर्चों पर दुश्मन से लोहा लेने ले गई:
- मेजर जनरल पी.एल. कुकरेती: इन्होंने युद्ध के दौरान रणनीतिक नेतृत्व प्रदान किया।
- मेजर जगदीश प्रसाद कुकरेती: युद्ध के मैदान में अग्रिम मोर्चे पर डटे रहे।
- रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती (शौर्य चक्र विजेता): इन्होंने गाजीपुर और ढाका तक के सफर में अदम्य साहस दिखाया।
- नायक सूबेदार सोहनलाल कुकरेती: ईएमई कोर में तकनीकी मोर्चे को संभाला।
- पाँचवें भाई: इन्होंने भी अपनी यूनिट के साथ दुश्मन की कमर तोड़ने में अहम भूमिका निभाई।
इनमें से तीन भाई राजपूत रेजिमेंट में थे और दो ईएमई (EME) कोर में।
ढाका की जीत और सकुशल वापसी लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) राकेश कुकरेती याद करते हैं कि युद्ध के दौरान कई दिनों तक परिवार को एक-दूसरे की कोई खबर नहीं थी। घर पर माता-पिता केवल रेडियो और समाचार पत्रों के भरोसे अपने पांचों बेटों की कुशलता की प्रार्थना करते थे। यह चमत्कार ही था कि ढाका में विजय पताका फहराने के बाद, युद्ध समाप्त होने पर पांचों भाई सुरक्षित अपने घर लौटे।
विरासत में मिली देशभक्ति कुकरेती परिवार को अब तक कुल चार वीरता पुरस्कार मिल चुके हैं। स्थानीय लोग और नेटिजन्स इस परिवार को ‘वीर जननी’ का सच्चा उदाहरण मान रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि “जिस मिट्टी के पांच-पांच बेटे एक साथ युद्ध में हों, उस देश को कोई कभी हरा नहीं सकता।”


