उत्तराखंड पेयजल निगम में वर्ष 2007 में कार्यकारी अभियंता के पद पर नियुक्त हुईं सरिता गुप्ता को लगभग दो दशक बाद डोमिसाइल विवाद का सामना करना पड़ा। उन पर आरोप था कि उन्होंने नौकरी सामान्य महिला श्रेणी में प्राप्त की थी, जबकि यह पद आरक्षण के तहत उत्तराखंड की मूल निवासी महिला के लिए निर्धारित था।
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लंबी जांच और आपत्तियों के बाद जून 2024 में निगम ने उन्हें सेवा से हटा दिया। यह निर्णय उनके लिए न केवल कैरियर बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी बड़ा झटका था, क्योंकि उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक इस पद पर सेवाएँ दी थीं।
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बर्खास्तगी के बाद सरिता गुप्ता ने नैनीताल हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी नियुक्ति नियमों के अनुसार वैध थी और बाद में डोमिसाइल से जुड़ी आपत्तियाँ राजनीति और विभागीय दबाव का परिणाम हैं।
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हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि सरिता गुप्ता की नियुक्ति को अवैध नहीं माना जा सकता और विभाग का आदेश अनुचित है। अदालत ने तत्काल प्रभाव से उनकी सेवा बहाल करने का निर्देश दिया।
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इस फैसले ने राज्य में डोमिसाइल और आरक्षण नियमों पर चल रही बहस को एक बार फिर से गर्म कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब सरकार को स्पष्ट नीति बनानी होगी ताकि भविष्य में कर्मचारियों को इस तरह की कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े।
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