देहरादून का घंटाघर आज फिर सचमुच “धड़क” रहा था। शाम 5 बजकर 25 मिनट पर जब मैं लैंसडाउन चौक के ठीक नीचे खड़ा था, तो ऊपर वाली बड़ी सुई ने एक झटके में 5 पर कदम रखा और छोटी सुई ने 25 को चूम लिया। ठीक उसी पल घंटाघर ने गंभीर आवाज में पाँच बार “घंट-घंट-घंट-घंट-घंट” बजाया, जैसे 112 साल पुराना दिल फिर जवानी में लौट आया हो। नीली एलईडी लाइटें भी पहली बार इतनी साफ चमकीं कि दूर राजपुर रोड से भी लोग रुक-रुक कर तस्वीरें ले रहे थे।
दिल्ली से आए मिस्त्री भाइयों ने बताया कि अंदर का जर्मन मेकैनिज्म इतना जंग खाया हुआ था कि स्प्रिंग को खोलते वक्त वो टूटते-टूटते बचा। दो दिन तक 40 फीट ऊपर लटक कर उन्होंने हर गियर को हाथ से साफ किया, पुरानी चेन की जगह स्टेनलेस स्टील की नई चेन डाली और सबसे खास बात, घड़ी को अब जीपीएस से सिंक कर दिया है। मतलब अब ये कभी 2 सेकंड भी आगे-पीछे नहीं होगी। जिलाधिकारी सोनिका मैम खुद शाम को वहाँ पहुँचीं और बच्चों के साथ सेल्फी लेते हुए बोलीं, “ये घंटाघर हमारा टाइमकीपर है, इसे हमेशा जवान रखेंगे।”
अब शाम की चाय की टपरी से लेकर नेहरू कॉलोनी की गलियों तक बस एक ही बात है – “घंटाघर ठीक हो गया रे!” लोग फिर पुरानी आदत में लौट आए हैं; स्कूटी रोक कर ऊपर देखते हैं, घड़ी मिलाते हैं और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते हैं। आज पहली बार किसी ने घंटाघर को “देहरादून का बिग-बेन” कहा और सब हँस पड़े। सचमुच, आज शहर की धड़कन फिर से सही समय पर धड़क रही है।
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