
पौड़ी गढ़वाल: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे लगातार पलायन का सबसे भयावह असर अब सरकारी स्कूलों पर दिखने लगा है। ताजा मामला जनपद पौड़ी के एक प्राथमिक विद्यालय से सामने आया है, जहाँ नए सत्र में छात्रों की संख्या शून्य हो गई है। स्कूल में एक भी बच्चा न होने के बावजूद शिक्षक को रोजाना समय पर स्कूल पहुंचना पड़ रहा है, जिससे स्कूल की उपयोगिता और विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।
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खाली स्कूल में हाजिरी लगा रहे शिक्षक संबंधित विद्यालय में वर्तमान में एक शिक्षक की तैनाती है। बताया जा रहा है कि पिछले सत्र में यहाँ इक्का-दुक्का छात्र थे, लेकिन उनके पास के स्कूलों में शिफ्ट होने या परिवार के पलायन कर जाने के बाद अब स्कूल पूरी तरह छात्र विहीन हो गया है। शिक्षक का कहना है कि वे रोजाना स्कूल खोलते हैं, लेकिन दिनभर बच्चों का इंतजार करने के बाद शाम को ताला लगाकर लौट जाते हैं।
उच्चाधिकारियों से मांगे निर्देश बच्चों की अनुपस्थिति में शिक्षक ने अब शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा है। शिक्षक ने पूछा है कि जब स्कूल में कोई छात्र ही नहीं है, तो उन्हें स्कूल में रहकर क्या करना चाहिए? क्या उन्हें किसी अन्य नजदीकी स्कूल में संबद्ध (Attach) किया जाएगा या उन्हें वहीं रहकर प्रशासनिक कार्यों का संपादन करना होगा?
पलायन की मार झेलते ‘घोस्ट स्कूल’ पौड़ी जिले में यह कोई इकलौता मामला नहीं है। कई गांवों में आबादी घटने के कारण स्कूल ‘घोस्ट स्कूल’ में तब्दील हो रहे हैं। शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में दर्जनों ऐसे स्कूल हैं जहाँ छात्र संख्या पांच से भी कम है। सरकार की ‘मर्जर नीति’ के बावजूद कई तकनीकी कारणों से ऐसे स्कूलों को अभी तक बंद या शिफ्ट नहीं किया जा सका है।
अधिकारियों का पक्ष इस मामले पर जिला शिक्षा अधिकारी का कहना है कि मामले की रिपोर्ट मांगी गई है। छात्र संख्या शून्य होने की स्थिति में संबंधित शिक्षक को पास के किसी अन्य विद्यालय में समायोजित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी, ताकि शैक्षणिक कार्य प्रभावित न हो और मानव संसाधन का सही उपयोग हो सके।


