उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने के प्रयास पिछले कुछ वर्षों में तेज़ हुए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर तस्वीर अभी भी अधूरी है। राज्य सरकार ने “स्मार्ट क्लास” और “डिजिटल लर्निंग” योजनाओं के तहत हज़ारों स्कूलों में प्रोजेक्टर, टैबलेट और इंटरनेट सुविधाएँ देने की घोषणा की थी। हालाँकि, ग्रामीण इलाक़ों में कई स्कूल ऐसे हैं जहाँ तकनीक की पहुँच अब भी नाममात्र की है।
देहरादून, हरिद्वार और नैनीताल जैसे शहरी जिलों के सरकारी स्कूलों में ई-क्लासेस और ऑनलाइन क्विज़ जैसी पहलें सफल रहीं हैं। कुछ स्कूलों में छात्र अब Google Classroom और Diksha App के माध्यम से पाठ्यसामग्री प्राप्त करते हैं। शिक्षकों का कहना है कि “डिजिटल टूल्स ने बच्चों में सीखने की रुचि बढ़ाई है और जटिल विषयों को समझाना आसान हुआ है।”
दूसरी ओर, पर्वतीय जिलों जैसे बागेश्वर, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी के कई स्कूलों में बिजली, इंटरनेट और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। कई जगह कंप्यूटर लैब तो बनी है, पर रखरखाव के अभाव में उपकरण निष्क्रिय पड़े हैं। एक शिक्षिका ने बताया, “हमारे पास कंप्यूटर तो हैं, पर बिजली और नेटवर्क नहीं। ऐसे में डिजिटल एजुकेशन केवल योजना के कागज़ों तक सीमित है।”
राज्य शिक्षा विभाग ने अब “School Tech Upgradation Mission 2025” के तहत हर ब्लॉक में एक “डिजिटल सपोर्ट टीम” गठित करने की योजना बनाई है, जो उपकरणों के रखरखाव और शिक्षकों के प्रशिक्षण पर ध्यान देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह पहल सही ढंग से लागू हुई तो आने वाले दो वर्षों में टेक्नोलॉजी की पहुँच 80% सरकारी स्कूलों तक संभव हो सकती है।
उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में तकनीक धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है — लेकिन पहाड़ों और मैदानों के बीच की डिजिटल खाई अब भी चुनौती बनी हुई है। जब तक बिजली, नेटवर्क और प्रशिक्षित शिक्षक हर स्कूल तक नहीं पहुँचेंगे, तब तक “स्मार्ट एजुकेशन” का सपना अधूरा ही रहेगा।
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