Khatling Glacier Lake Threat: वैज्ञानिकों की चेतावनी, खतलिंग ग्लेशियर झील से उत्तराखंड पर मंडराया खतरा
उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और वैश्विक तापमान (Global Warming) वृद्धि का गंभीर असर दिखाई देने लगा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है कि टिहरी जिले में स्थित खतलिंग ग्लेशियर (Khatling Glacier) के मुहाने पर तेजी से एक विशालकाय हिमनदीय झील (Glacial Lake) का आकार बढ़ रहा है। यदि भविष्य में यह झील भूस्खलन या अत्यधिक जलभराव के कारण फटती है (Glacial Lake Outburst Flood - GLOF), तो निचले इलाकों और नदी घाटियों में भारी तबाही मच सकती है। 📡 सैटेलाइट डेटा से हुआ खुलासावाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और अन्य अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा सैटेलाइट इमेज और रिमोट सेंसिंग डेटा के अध्ययन से पता चला है कि पिछले कुछ दशकों में ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के कारण यह झील अस्तित्व में आई है।1968 से पहले इस क्षेत्र में ऐसी किसी झील का अस्तित्व नहीं था। 1990 के दशक के बाद सैटेलाइट तस्वीरों में इस झील का आकार धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। ग्लेशियर के लगातार पीछे खिसकने (Glacier Retreat) और बर्फ पिघलने के कारण इस झील का दायरा और गहराई तेजी से बढ़ रही है।🌊 4000 क्यूमेक से अधिक जलप्रवाह का खतरावैज्ञानिकों के गणितीय मॉडलिंग और जलविज्ञान अध्ययनों के अनुसार, यदि यह झील टूटती है, तो इससे लगभग 4,377 क्यूमेक पानी का भीषण सैलाब अचानक निचले इलाकों में उतर सकता है। यह जलप्रवाह भिलंगना नदी (Bhilangana River) में भयंकर बाढ़ ला सकता है, जिससे किनारे बसे दर्जनों गांव, बुनियादी ढांचे, पुल और सड़कें पल भर में बह सकती हैं। इसके अलावा, भिलंगना नदी आगे जाकर भागीरथी में मिलती है, जिससे टिहरी बांध (Tehri Dam) के जलस्तर और निचले ऋषिकेश-हरिद्वार क्षेत्रों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ⚠️ 2013 की चोराबारी जैसी पुनरावृत्ति की आशंकावर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के दौरान चोराबारी ताल (Chorabari Lake) के फटने से हुई तबाही का खौफ आज भी देवभूमि में बरकरार है। वैज्ञानिकों का कहना है कि खतलिंग ग्लेशियर के सामने बन रही यह झील भी उसी तरह का संवेदनशील और खतरनाक रूप ले रही है। 🛡️ वैज्ञानिकों और प्रशासन के सुझावनिरंतर मॉनिटरिंग (In-Situ & Satellite Monitoring): झील के जलस्तर, तटबंधों की मजबूती और ग्लेशियर की हलचल पर 24/7 निगरानी रखी जाए।अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning System): भिलंगना घाटी के संवेदनशील क्षेत्रों में स्वचालित अलार्म और सेंसर स्थापित किए जाएं। साइफनिंग और पानी की निकासी: यदि जलस्तर सुरक्षित सीमा से ऊपर जाता है, तो नियंत्रित तरीके से साइफन पाइप के जरिए पानी निकाला जाए। आपदा प्रबंधन तैयारी: निचले क्षेत्रों में निवास करने वाली आबादी को सतर्क रखने और आपातकालीन आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली को चाक-चौबंद करने की आवश्यकता है।





